घिसी-पिटी प्रेम कथा
लोग कहते हैं—
“क्या फिर से वही घिसी-पिटी प्रेम कथा लेकर आ गई?”
अब घिसी-पिटी हो
या
सजती-सँवरती,
आख़िर
कथा तो प्रेम की ही है।
हर बार
लिख दूँ
नए नाम से,
पर—
धड़कनें तो
वही रहती हैं।
कहीं
इज़हार जल्दी हो जाता है,
कहीं ज़िंदगी
एक “काश”
ही बनकर बह जाती है।
परंतु—
दर्द,
उम्मीद,
बेचैनी,
मुस्कुराहट,
और वह एक नाम—
ये सब भी तो
इसी प्रेम का काम है।
रहने दो
इस कहानी को
घिसी-पिटी ही।
पुराना हो जाए
जितना भी यह वक़्त,
प्रेम—हर बार
उतना ही
नया महसूस होता है।


good read aris, nice one