उलझ जाओ
16/06/2026
जैसे तुम थे मिले,
क्या फिर से उलझोगे तुम?
उलझोगे यूँ,
जैसे साँसें सीने में उलझ जाती हैं,
जब तक नाम तुम्हारा
लबों पर पहुँच पाता है।
उलझोगे क्या
इन नज़रों में तुम?
जैसे चाँद
झील के पानी पर उतर आता है।
उलझोगे यूँ,
जैसे बारिश की बूँदें
जुल्फ़ों में ठहर जाती हैं।
या फिर ऐसे...
जैसे मेरी हर दुआ
तेरे ही नाम से
उलझी रह जाती है।


"jaise chand jheel ke paani par utar aata hai."
The personification and surreal metaphor in one sentence. So good.
This piece needs recognition